मजदूर एकता पत्रिका- ९

मजदूर एकता पत्रिका- ९
संपादकीय (अंक 9)
फासीवादी हमलों के खिलाफ संघर्ष के लिए आगे आओ!आज फासीवादी शक्तियाँ मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनता पर बर्बर हमले कर रही हैं। उन्होंने मजदूरों पर श्रम संहिता, ठेका प्रथा, हायर और फायर, थोड़े समय का रोजगार जैसी नीतियों को थोप दिया है। वे मजदूरों की रोजी–रोटी छीनकर पूँजीपतियों का मुनाफा बढ़ाने पर ही आमादा नहीं हैं, बल्कि मेहनतकश जनता के लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन भी कर रही हैं। यूनियन बनाने, हड़ताल करने, अपना प्रतिनिधि चुनने और न्याय पाने के अधिकार को खत्म करने की पुरजोर कोशिश चल रही है।इतना ही नहीं, वे मजदूर वर्ग और अन्य मेहनतकश जनता के बीच सामन्ती और पुरातनपंथी विचारों का प्रचार–प्रसार करके उनकी एकता को तोड़ रही हैं। जनता को दिमागी गुलामी का शिकार बनाया जा रहा है। उसे धर्मोन्माद और दंगे–फसाद का मुहरा बना देने की साजिश रची जा रही है।मजदूरों से 12–12 घण्टे काम कराया जा रहा है। इतने से मन नहीं भरा तो पूँजीपति बड़ी बेशर्मी से कह रहे हैं कि मजदूरों को हफ्ते में 90 घण्टे काम करना चाहिए। वे मजदूरों के खून की आखिरी बूँद तक निचोड़ लेते हैं। मजदूरों को पूरी तरह निचोड़ लेने के बाद आम की गुठली की तरह फेंक दिया जाता है। मजदूरों के शोषण–उत्पीड़न की कोई सीमा नहीं है। अथाह शोषण और लूट ने उनकी जिन्दगी को तबाह कर डाला है।इलाज के अभाव में मजदूर ऐसी छोटी–छोटी बीमारियों से असमय मौत के मुँह में समाते जा रहे हैं जिनकी दवाइयाँ मौजूद हैं। इलाज और शिक...

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दिल्ली के असंगठित मजदूरों की हालत

दिल्ली भारत की राजधानी है। जहाँ हर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी को देश के प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं। जहाँ हमारे देश का संविधान बनाया गया है। जहाँ बड़ी–बड़ी मीटिंग होती हैं कि देश को कैसे चलाना है, व्यापार कैसे करना है? दिल्ली एक चमचमाता शहर है। पर इसी चमचमाते शहर में न जाने कितने मेहनतकश मजदूर दिन–रात मेहनत करते–करते भूख और गरीबी में दम तोड़ रहे हैं। जिन्दगी की जंग हार रहे हैं.....

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आशा वर्करों से गुफ्तगू

हमने तीन आशा वर्करों––रज्जो, रोशनी और सीता से बातचीत की जो मेरठ के प्यारेलाल अस्पताल में काम करती हैं। इन सबसे बात करके हमें अच्छा लगा क्योंकि वे खुशमिजाज और निडर हैं। वे बहुत मेहनती भी हैं। रज्जो और सीता की आर्थिक हालत ठीक नहीं है। इनके पति मजदूरी करते हैं, जबकि रोशनी की आर्थिक हालत थोड़ी ठीक है। उसके पति की प्रिंटिंग की दुकान है। इन तीनों में अच्छी यारी–दोस्ती है। उनके काम और समस्याओं आदि से सम्बन्धित जो बातचीत हमने की उसका कुछ हिस्सा हम यहाँ दे रहे हैं।

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